Saturday, May 5, 2018

Exclusive: BJP कर्नाटक प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर बोले- कांग्रेस जा रही है और बीजेपी आ रही है

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रविंद्र कुमार, बंगलुरू: कर्नाटक विधानसभा चुनाव का समर अपने चरम पर है. राजनीतिक दलों के चर्चित चेहरे एक दिन में कई-कई रैलियों में शिरकत करते नजर आ रहे हैं. कर्नाटक के चुनावी खुमार के बीच ही बेंगलुरू में जी मीडिया ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री और बीजेपी कर्नाटक प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर के साथ खास बातचीत की. बातचीत के दौरान जावड़ेकर ने एक बार फिर दावा किया कि कर्नाटक से कांग्रेस जा रही है और बीजेपी आ रही है. इसके साथ ही उन्होंने कई अन्य मुद्दों पर भी जी मीडिया से बातचीत की. पढ़ें इंटरव्यू में पूछे गए सवाल और उनके जवाब...


सवाल- क्या कांग्रेस मुक्त हो पाएगा कर्नाटक?
जावड़ेकर- बिलकुल, कर्नाटक से कांग्रेस जा रही है बीजेपी आ रही है. हम पूर्ण बहुमत और अप्रत्याशित जीत की तरफ जा रहे हैं. हमें कोई आशंका नहीं है. मोदी जी के आने के बाद कांग्रेस ने हर चुनाव में अपना राज्य खोया है. कर्नाटक के आसपास ही पहले तेलंगाना, फिर आंध्रा, फिर केरल खोया, महाराष्ट्र खोया. चारों आसपास के राज्य खोए, अब कर्नाटक भी जा रहा है. इसी तरह नॉर्थ ईस्ट में भी अपने राज्य खोए. जम्मू कश्मीर, हरियाणा, हिमाचल और उतराखंड, झारखंड जहां भी कांग्रेस सत्ता में थी, हारी है. 
कांग्रेस मुक्त भारत का मतलब मोदी जी ने अच्छा समझाया. हम कांग्रेस का जो corruption का कल्चर है उससे मुक्त करना चाहते हैं. कांग्रेस ने राजनीति में जो गंदगी फैलाई, उससे मुक्त करना चाहते हैं. कुशासन से मुक्त करना चाहते हैं. ये एक तरह से कल्चर की लड़ाई है. भारत की जो तरक्की नहीं हुई, हम उसके लिए लड़ रहे हैं. 


सवाल- राहुल गांधी कह रहे हैं कर्नाटक से भाजपा का हार का सिलसिला शुरू होगा और ये राजस्थान एमपी होते हुए 2019 तक जाएगा. यानी कहीं न कही उनकी भी तैयारी है कर्नाटक के द्वारा 2019 जीतने की? 
जावड़ेकर- ये तैयारी है या दिन में देखा हुआ सपना है, ये 15 तारीख को पता चल जाएगा. सच्चाई ये है कि लोकतंत्र में दिन में सपने देखने की मनाही नहीं है.


सवाल- आपने करप्शन की बात की, corruption मुक्त भारत बनाने की बात कही, कांग्रेस इसकी जननी है ऐसा आप कह रहे हैं लेकिन येदियुरप्पा जो आपके CM उम्मीदवार हैं. 2012-13 में उनको इसी आधार पर निकाला गया था भाजपा से. क्या आपकी नजर में आज वो पाक साफ हो गए?
जावड़ेकर- क्योंकि कोर्ट ने उनको बरी किया और आज उन पर कोई आरोप नहीं है, सभी आरोप गलत साबित हुआ. वो अपनी अलग पार्टी बनाए, 13 में तो हम सत्ता में बने रहते, अगर पार्टी तीन फाड़ में न होती. क्योंकि हमने सुशासन दिया था अच्छा काम किया था. इस बार सब एकजुट है, एक पार्टी है और यहां पूरा माहौल बन गया है. और येदियुरप्पा जी के प्रति लोग "रेत बंदू आपते मित्र" कहते हैं. किसानों ओर देहात में एक अच्छे प्रशासक और न्याय करने वाले राजा के रूप में उनको देखते हैं. 


सवाल- लोगों में ये भी पहचान है कि लिंगायत को लेकर अलग धर्म का जो मसला उठा था, अभी की सरकार ने आपको भेजा है, 2013 में सिग्नेचर करने वालो में येदियुरप्पा भी थे, जिसका विरोध अब आप भी कर रहे हैं, येदियुरप्पा भी कर रहे हैं. क्या ये मुद्दा आपके लिए परेशानी का सबब बन रहा है कर्नाटक में?
जावड़ेकर- बिलकुल नहीं, ये दांव कांग्रेस पर उलट गया है. क्योंकि कांग्रेस की रणनीति हमेशा समाज को बांटने की रही है. मणिपुर चुनाव में भी मैं इंचार्ज था, तब भी कांग्रेस की नीति नागा कूकी मैंती, तीनों में लड़ाई करते रहो, रोड ब्लॉक करते रहो, बंद होता रहे, और लोग आपस में झगड़ते रहे ताकि कांग्रेस सत्ता में बनी रहे लेकिन अब हमारी सरकार आई तो सारी मिलिटेंसी खत्म होने लगी. पूरा लॉकआउट बंद हो गया. और सभी तीनों जाति एकसाथ काम कर रही हैं. यहां भी लिंगायत के मुद्दे पर कांग्रेस ने एकसमाज बांटने की कोशिश की, उसके लिए समाज में ही बहुत रिएक्शन है और कांग्रेस का ये दांव उलट गया है. कांग्रेस के बड़े-बड़े लिंगायत नेता आप किसी को भी पूछो लोग गलत मुहीम ही बताएंगे. कांग्रेस फिर साढ़े चार साल चुप क्यों रही, ये सिर्फ येदियुरप्पा को सीएम बनाने से रोकने की कवायद थी, जो उन्हें उलटी पड़ गई.


सवाल- येदियुरप्पा को रोकने का दांव था, कर्नाटक में ये भी प्रचलित है की बीजेपी के कई बड़े नेता चाहते है कि 90 से ज्यादा नहीं आए, इनको क्लब 90 कहा जा रहा है?
जावड़ेकर- ऐसा है ये मीडिया की क्या परिभाषा है मुझे समझ नहीं आती. क्योंकि लोक सभा के पहले लोग कहते थे के बीजेपी में एक ऐसा क्लब है जो कहती है बीजेपी 200 से ज्यादा नहीं आएगी, लेकिन 282 आए. यहां ऐसा कोई क्लब नहीं है, 90 की कोई बात नहीं कर रहा है. हमारा पूर्ण बहुमत होगा. हंग असेंबली नहीं होगी और बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाएगी.


सवाल- या फिर JDS के साथ? क्योंकि PM मोदी, देवगौड़ा की बड़ाई कर रहे हैं? कुमार स्वामी पर कोई अटैक नहीं किया जा रहा है तो क्या हंग असेंबली की स्थिति में आप जेडीएस का सपोर्ट लेंगे या उन्हें समर्थन देंगे?
जावड़ेकर- नहीं, जेडीएस के खिलाफ तो हम लड़ रहे हैं. पीएम ने देवगौड़ा के लिए जो कहा, वो सभ्यता और शिष्टाचार का मसला है कि जिसमें पीएम पूर्व पीएम की इज्जत करते हैं. आज भी देवगौड़ा जी खुद लोगों का काम लेकर आते हैं अपना यही अनुभव मोदी जी ने बताया. क्योंकि राहुल गांधी ने बहुत ही विचित्र तरीके से देवगौड़ा जी की बात कही थी. हंग असेंबली नहीं बनेगी. पूर्ण बहुमत मिलेगा. BJP सत्ता में आएगी. इसलिए इस बार हमने मैनिफेस्टो की जगह वचन कहा है. नम कर्नाटक नमः वचना.


सवाल- इसी वचन में महिलाओं के लिए विशेष ध्यान दिया गया है मंगलसूत्र, स्मार्टफोन? मंगलसूत्र से मंगल होगा BJP का?
जावड़ेकर- ये BJP का मंगल होने का मुद्दा नहीं है. महिलाओं के सशक्तिकरण का एक सतत लगातार प्रयास मोदी सरकार कर रही है. अगर कुपोषण जैसी समस्या से हम जूझ रहे हैं तो ऐसे में गर्भवती रहते हुए ही महिला को अच्छा खाना मिले तो नवजात शिशु को भी अच्छा खाना मिले. फिर 6 महीने की उसको परवरिश के लिए छुट्टी मिले. उसकी सभी दवाए इंद्रधनुष पैकेज में सारे टीकाकरण हों. ये हमारा मूल प्रयास है. इसी में गरीब महिलाओं को भी एक स्मार्टफोन देना उसकी सशक्तिकरण का ही हिस्सा है. वो भी बात करना और जानकारी लेना चाहती है. ताकि उसका अच्छा उपयोग कर सके. और उसके साथ-साथ हमारे यहां सोने का महत्व है. इसलिए गरीब परिवार की शादी में 3 ग्राम सोना ओर 25000 रुपये हम देंगे. किसी को ये गलत लगेगा, मगर गले में मंगलसूत्र सुहाग की निशानी है.


सवाल- टीपू सुल्तान को लेकर कर्नाटक में काफी सियासत हुई. अब यही सियासत पाकिस्तान की तरफ से देखने को मिल रहा है और टीपू सुल्तान को टाइगर ऑफ मैसूर कह कर कहीं न कहीं भड़काने वाली बात कह कर बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है पाकिस्तान द्वारा?
जावड़ेकर- पाकिस्तान क्या कर रहा है उससे मुझे कोई लेना-देना नहीं, लेकिन कांग्रेस जो एक जयंती कर रही और विवेकानंद जयंती नहीं कर रही है, ये लोगों को समझ आ रहा है. हमारा कांग्रेस पर सबसे बड़ा प्रहार यही है कि आप मुसलमान को, गरीब को एक वोट बैंक की नजर से देखते हो. हम इस नजर से नहीं देखते. सबका साथ सबका विकास. हमारी उज्ज्वला योजना में मजहब नहीं देखा जाता. मुस्लिम बहनों को भी गैस मिला है. टीपू सुल्तान कोई मुद्दा नहीं है.


सवाल- पाकिस्तान पर ही, पाकिस्तान के जनक जिन्ना, जिसके प्रति BJP की अपनी ही विचार धारा है. जिन्ना की मजार पर जाने के कारण से आडवाणी जी को भी अध्यक्ष पद से हटना पड़ा था. जसवंत सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था. आपके शासन में AMU में जिन्ना की तस्वीर और सरकार चुप, आप चुप?
जावड़ेकर- नहीं-नहीं, ये चुप रहने का मसला नहीं है. ये अभी जो आंदोलन का मुद्दा है, वो मुद्दा वहां जो मारपीट हुई कोई बाहर वाला छात्रों को मारपीट किया, इसके कारण वो छात्र धरने पर हैं और उनकी मांग है कि जिन्होंने मारपीट की उनकी गिरफ्तारी हो और पुलिस पर कार्यवाही हो. क्योंकि उन्होंने बचाया नहीं. ये मुद्दा अलग है. वहां कुलपति निश्चित रूप से छात्रों से संवाद कर रहे हैं. इसके दो पक्ष हैं जिसमें मारपीट होने वाले छात्रों का आंदोलन चला.


सवाल- योगी जी बोलते हैं जिन्ना बर्दाश्त नहीं और BJP की भी यही नीति रही है, विचारधारा रही है कि जिन्ना बर्दाश्त नहीं. लेकिन जिन्ना की तस्वीर और जिन्ना पर आपकी क्या राय है?
जावड़ेकर- जिन्ना पर पार्टी की राय सबको पता है. और इसलिए वो फिर से दोबारा बताने की जरूरत नहीं. और अभी जो विवाद वहां पर है उस पर हमारे कुलपति लगातार संवाद करके नजर बनाए हुए हैं.


सवाल- हामिद अंसारी साहब भी इस पर कूद गए हैं?
जावड़ेकर- नहीं इसकी मुझे जानकारी नहीं है.


सवाल- जिन्ना की तस्वीर अभी हटनी चाहिए?
जावड़ेकर- मैं अभी कर्नाटक में व्यस्त हूं.


सवाल- आखिरी सवाल, क्योंकि येद्दयुरप्पा जी ने डेट तय कर दी है 17  या 18 को सीएम पद की शपथ लेंगे. लेकिन, कांग्रेस भी यही कह रही है?
जावड़ेकर- मैंने कहा है कि दिन में सपना देखने का अधिकार कांग्रेस को है. लेकिन, हम जो कह रहे हैं वो grounds well support है. आप बंगलुरू या बाहर में किसी भी किसान या लोगों से महिलाओं से बात करिए. बंगलुरू की अभी कैसी व्यवस्था है, गार्डन सिटी को गार्बेज सिटी बनाया. बंगलुरू के तालाब में पूरा सीवर डाल दिया और तालाब खराब हो गए. सड़क में गड्ढे होने से 190 लोगों की मौत हो चुकी है. corruption के मामले सामने आ रहे हैं. कानून-व्यवस्था ध्वस्त है. गुंडाराज है, 3500 किसानों की आत्महत्या हुई है. यही सब इश्यू हैं जिससे लोग 12 तारीख की वोट कर रहे हैं. ताकि कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा सकें.




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Friday, May 4, 2018

Pm Modi Is Making Bjp Wave In By Rallies In Karnataka - कर्नाटक चुनाव: मोदी की रैलियों से बीजेपी की लहर बनाने की कोशिश

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ख़बर सुनें



कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुरुआत में केवल 12 रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई थी। लेकिन जैसे जैसे प्रचार जोर पकड़ रहा है, मोदी की रैलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पहले 12 से बढ़कर 15 हुई, उसके बाद 18 और अब यह तय हुआ है कि कर्नाटक में प्रधानमंत्री की कुल 21 रैलियां आयोजित कर बीजेपी की लहर बनाई जाए।

फिलहाल वे एक दिन छोड़कर कर्नाटक का दौरा कर रहे हैं। लेकिन मतदान के पास आने पर वे रोज कर्नाटक जाएंगे। चूंकि प्रधानमंत्री की हर रैली में दो लाख से तीन लाख लोग आ रहे हैं, पार्टी को विश्वास है कि इन रैलियों से उन्हें सुनिश्चित बढ़त प्राप्त होगी।

प्रधानमंत्री केवल रैलियां ही संबोधित नहीं कर रहे हैं। जिस दिन वे कर्नाटक नहीं जा पा रहे हैं उस दिन वे नमो ऐप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करते हैं। कभी युवाओं से, कभी महिलाओं से तो कभी व्यापारियों से। इससे न सिर्फ कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हो रहा है बल्कि प्रधानमंत्री स्वयं जमीनी हकीकत से रोज रूबरू हो रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है कि बीजेपी प्रधानमंत्री मोदी का चुनाव में इतना ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के अंतिम दौर में उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी के गली-मोहल्लों की पदयात्रा कर धूम मचा दी थी। विपक्ष जिसे मोदी की घबराहट का प्रतीक बता रहा था, उसी रणनीतिक कदम की वजह से बीजेपी को सहयोगियों के साथ उत्तर प्रदेश की 403 में से 325 सीटें मिली थी।

इसी तरह उन्होंने त्रिपुरा, असम, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। लेकिन दक्षिण भारत का द्वार होने के नाते कर्नाटक का महत्व अलग है। यहां मिली बड़ी जीत अगले साल के लोकसभा चुनाव पर भी असर डालेगी। इसीलिए, यूपी के बाद मोदी सबसे ज्यादा प्रचार कर्नाटक में ही कर रहे हैं।


बीजेपी की कोशिश कांग्रेस के अहिंदा (अल्पसंख्यक, हिंदूइदावरू यानी ओबीसी और दलित) के गढ़ में सेंध लगाने की है। उन्हें उम्मीद है कि उसके दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक का एक हिस्सा जद (स) को जाएगा। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया स्वयं पिछड़ी कुरुबा जाति से हैं। प्रधानमंत्री मोदी उसके ओबीसी कार्ड का मजबूत काट हैं।

दक्षिण का मायाजाल

बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि दक्षिण कर्नाटक की फिलहाल जद (स) बनाम कांग्रेस लड़ाई को यदि वे त्रिकोणीय बना सकें तो चुनावी नतीजे अलग ही आएंगे। यहां 10 से 12 सीटें जीतने के लिए बीजेपी को मोदी का ही सहारा है।

लिंगायत कार्ड

पार्टी का मानना है कि कांग्रेस अंतिम अस्त्र के तौर पर बीजेपी की केंद्र सरकार पर लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने वाले राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी न देने का आरोप लगाएगी। लेकिन बीजेपी के भरोसा है कि इससे उन्हें अधिक नुकसान नहीं होगा।
 



कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुरुआत में केवल 12 रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई थी। लेकिन जैसे जैसे प्रचार जोर पकड़ रहा है, मोदी की रैलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पहले 12 से बढ़कर 15 हुई, उसके बाद 18 और अब यह तय हुआ है कि कर्नाटक में प्रधानमंत्री की कुल 21 रैलियां आयोजित कर बीजेपी की लहर बनाई जाए।


फिलहाल वे एक दिन छोड़कर कर्नाटक का दौरा कर रहे हैं। लेकिन मतदान के पास आने पर वे रोज कर्नाटक जाएंगे। चूंकि प्रधानमंत्री की हर रैली में दो लाख से तीन लाख लोग आ रहे हैं, पार्टी को विश्वास है कि इन रैलियों से उन्हें सुनिश्चित बढ़त प्राप्त होगी।

प्रधानमंत्री केवल रैलियां ही संबोधित नहीं कर रहे हैं। जिस दिन वे कर्नाटक नहीं जा पा रहे हैं उस दिन वे नमो ऐप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करते हैं। कभी युवाओं से, कभी महिलाओं से तो कभी व्यापारियों से। इससे न सिर्फ कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हो रहा है बल्कि प्रधानमंत्री स्वयं जमीनी हकीकत से रोज रूबरू हो रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है कि बीजेपी प्रधानमंत्री मोदी का चुनाव में इतना ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के अंतिम दौर में उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी के गली-मोहल्लों की पदयात्रा कर धूम मचा दी थी। विपक्ष जिसे मोदी की घबराहट का प्रतीक बता रहा था, उसी रणनीतिक कदम की वजह से बीजेपी को सहयोगियों के साथ उत्तर प्रदेश की 403 में से 325 सीटें मिली थी।

इसी तरह उन्होंने त्रिपुरा, असम, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। लेकिन दक्षिण भारत का द्वार होने के नाते कर्नाटक का महत्व अलग है। यहां मिली बड़ी जीत अगले साल के लोकसभा चुनाव पर भी असर डालेगी। इसीलिए, यूपी के बाद मोदी सबसे ज्यादा प्रचार कर्नाटक में ही कर रहे हैं।






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ओबीसी बनाम ओबीसी







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मध्यप्रदेश में जेब में प्याज लेकर क्यों घूम रहे हैं बीजेपी विधायक?

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ध्यप्रदेश में प्याज किसानों को भले ही रुलाए लेकिन बीजेपी के लिए ये सियासी दवा से कम नहीं है.





मध्यप्रदेश में जेब में प्याज लेकर क्यों घूम रहे हैं बीजेपी विधायक?

जेब में प्याज लेकर घूमने की सलाह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दी है...(फोटो साभार: Facebook)







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पालघर उपचुनाव: बीजेपी को झटका, दिवंगत सांसद के परिवार के सदस्य शिवसेना में शामिल

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पालघर: लोकसभा के दिवंगत सदस्य चिंतामन वनगा के परिवार के सदस्य बीजेपी को झटका देते हुए शिवसेना में शामिल हो गए हैं. वनगा के परिवार के सदस्यों ने बीजेपी पर 'अन्याय' का आरोप लगाया है. बीजेपी सांसद चिंतामन वनगा का 30 जनवरी को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था. वनगा की विधवा जयश्री व उनके बच्चों श्रीनिवास व प्रफुल्ल ने शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से गुरुवार को मुलाकात की और बीजेपी छोड़ने के अपने फैसले की घोषणा की.


जयश्री वनगा ने कहा, "बीते 35 सालों से चिंतामन वनगा ने इस इलाके में पार्टी को तैयार किया, लेकिन बीजेपी नेताओं ने हमारे साथ अन्याय किया और पूरी तरह से हमे नजरअंदाज किया. हमने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व बीजेपी के राज्य इकाई के अध्यक्ष राव साहेब पाटिल-दानवे से मिलने का समय मांगा, लेकिन हमें कोई जवाब नहीं मिला."


परिवार ने कहा कि इसी के मद्देनजर उसने भारतीय जनता पार्टी छोड़ने व शिवसेना में शामिल होने का फैसला किया. वनगा परिवार का शिवसेना में स्वागत करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि वनगा परिवार ने हिंदुत्व वोटों को बिखराव से बचाने व हिंदुत्व विचारधारा के लिए शिवसेना के साथ आने का फैसला किया है.


Chintaman Vanga
पालघर के बीजेपी सांसद चिंतामन वनगा का 30 जनवरी को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था. 


उद्धव ठाकरे ने कहा, "हम वनगा परिवार के प्रति अत्यधिक सम्मान रखते हैं. उन्होंने आगामी लोकसभा उपचुनाव (28 मई) के लिए पार्टी से टिकट की मांग नहीं की है. हम पालघर के शिवसेना कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर चर्चा करने के बाद उम्मीदवार पर अंतिम रूप से फैसला लेंगे."


उन्होंने कहा कि अगर यह एक चुनावी टिकट लेने भर का मामला होता तो वे किसी भी पार्टी में जा सकते थे, लेकिन उन्होंने वैचारिक आधार पर शिवसेना में शामिल होने को तरजीह दी. जयश्री वनगा ने कहा कि बीते कई दशकों से शिवसेना के संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे व उनके बेटे उद्धव ठाकरे से उनके सौहार्द भरे आत्मीय संबंध रहे हैं. उद्धव ठाकरे ने कहा कि भविष्य के चुनावों में बीजेपी के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा. उन्होंने कहा कि पार्टी नेताओं के साथ बैठक के बाद इस महीने के अंत में होने वाले पालघर व भंडारा-गोडिया लोकसभा उपचुनावों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की जाएगी.


(इनपुट IANS से)




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क्या सच में शिवराज सिंह चौहान की जगह नया चेहरा लाएगी बीजेपी?

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भोपाल: मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जो गुरुवार को एक कार्यक्रम में कहा था कि 'मेरी खाली कुर्सी पर अब काई भी बैठ सकता है' उसके मायने निकाले जा रहे हैं. हालांकि शिवराज ने यूटर्न लेते हुए अपने बयान को 'मजाक' बताया था लेकिन सच तो यह है कि पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में उनकी जगह नए चेहरे को लाने पर तेजी से मंथन चल रहा है. कोशिश चल रही है कि साफ छवि वाला, संघ का करीबी, सभी वर्गो और नेताओं में गहरी पैठ बनाने वाले किसी युवा चेहरे को जिम्मेदारी सौंपी जाए.


पार्टी और संघ फैसला जल्दी लेने का मन बना चुका है, क्योंकि अगर देर हुई तो शिवराज के चेहरे पर ही पार्टी को अगला चुनाव लड़ना होगा. पार्टी को लगता है कि नए चेहरे से कांग्रेस 15 साल का हिसाब भी नहीं मांग पाएगी और यह भी संभव है कि नया चेहरा देख जनता व्यापम से लेकर आरती घोटाले तक को भूल जाए. किसान आत्महत्याओं, किसान गोलीकांड और भावांतर के भंवर पर पर्दा डालने में भी नया चेहरा मददगार साबित हो. 


उधर, कांग्रेस ने भी चुनाव से पहले अपने संगठन में बड़ा बदलाव किया है. प्रदेश अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को बनाया गया है तो चुनाव प्रचार अभियान समिति का प्रमुख युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को बनाया गया है. पिछले दिनों दोनों नेताओं के दौरे और मेगा रोड शो से कार्यकर्ता उत्साहित हैं.


सूत्रों का कहना है कि विभिन्न माध्यमों से आई सूचनाओं ने आरएसएस को राज्य के वर्तमान नेतृत्व पर विचार के लिए मजबूर किया है. उसी के चलते प्रदेशाध्यक्ष के पद पर नंदकुमार सिंह चौहान के स्थान पर राकेश सिंह को जिम्मेदारी सौंपी गई है. अब सत्ता के खिलाफ पनपे असंतोष की तोड़ खोजने का दौर जारी है. 


आरएसएस के सूत्रों का दावा है कि सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन का मन बना लिया गया है, कई नामों पर चर्चा जारी है. अमित शाह का भोपाल दौरा भी इसी मसले को लेकर है. यह बात अलहदा है कि सत्ता और संगठन के लोग अभी इस बात को स्वीकार नहीं रहे हैं. केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत कह रहे हैं कि अगला चुनाव शिवराज के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा और 'बच्चों के मामा' ही मुख्यमंत्री होंगे. बताते चलें कि दिल्ली से लौटे शिवराज ने गुरुवार को भोपाल में आनंद व्याख्यान में एक सांकेतिक बयान देकर बदलाव की चर्चाओं को और हवा दे दी थी. उन्होंने कहा था, "दुनिया में कुछ भी परमानेंट नहीं है, मुझे जल्दी जाना है, मेरी कुर्सी पर अब कोई भी बैठ सकता है." 


शिवराज के बयान पर राज्य की सियासत गरमा गई, कांग्रेस नेताओं ने तरह-तरह के ट्वीट किए. जब चौहान को लगा कि उनके बयान का बड़ा राजनीतिक मायने है, तो उन्हें कुछ घंटों बाद ही एक ट्वीट करके न केवल सफाई देनी पड़ी, बल्कि अपने बयान को ही मजाक करार दे दिया.


मुख्यमंत्री ने आनंद व्याख्यान में दिए बयान के लगभग पांच घंटे बाद ट्वीट किया था- "कार्यक्रम में मेरे लिए आरक्षित रखी गई कुर्सी को लेकर थोड़ा सा मजाक क्या कर लिया. कुछ मित्र अत्यंत आनंदित हो गए! चलो, मेरा आनंद व्याख्यान में जाना सफल हो गया."


पिछले दिनों आरएसएस सहित विभिन्न संस्थाओं ने चुनाव पूर्व सर्वेक्षण कराए हैं, जिसमें राज्य सरकार की स्थिति के संदर्भ में सकारात्मक संदेश नहीं मिले हैं. यही कारण है कि भाजपा और संघ की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. संघ के सूत्रों का कहना है कि अब से लगभग एक दशक पहले डंपर कांड ने जोर पकड़ा था, मगर कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट दे दी थी, उसके बाद व्यापम घोटाला आया, उससे भी सरकार और पार्टी उबर आई, मगर इस समय जारी रेत खनन ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अवैध रेत खनन बड़ा मुद्दा बन गया है. विभिन्न वर्गो को योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है. मुख्यमंत्री के आसपास के नौकरशाहों की छवि भी अच्छी नहीं है. साथ ही कई अन्य फैसलों ने भी सरकार की छवि को प्रभावित किया है. 


राजनीति के जानकारों का कहना है कि शिवराज का दिल्ली दौरा और उसके लौटते ही उनका 'खाली कुर्सी' वाला बयान यूं ही नहीं था, बल्कि भाजपा के भीतर चल रही जोड़-तोड़ की हकीकत उनकी जुबान से सार्वजनिक तौर पर सामने आ गई. शिवराज गंभीर नेता हैं, वे कभी भी हल्की बात नहीं करते. उनके बयान के निहितार्थ होते हैं, जिसे कांग्रेस ने तुरंत लपक लिया और आखिर में शिवराज को सफाई देनी पड़ी. 


पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बीच रामलाल के साथ मध्यप्रदेश का दौरा राजनीतिक हलचल की ओर इशारा करता है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद मध्यप्रदेश पर भी पार्टी कोई फैसला ले सकती है, या फिर शिवराज के नेतृत्व में ही चुनाव में जा सकती है. ये दोनों विषय पार्टी हाईकमान और संघ के बीच दिवालघड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहे हैं. इसके बावजूद इतना तो तय है कि अगले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा निश्चिंत नहीं है, भले ही उसने 'अबकी बार 200 पार' का नारा दे दिया हो. 


(इनपुट IANS से)




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